' अधूरे हम ' (एक अधूरी प्रेम कहानी) Adhure hum (An incomplete love story)

जुबां थकते नहीं मेरे लेते रहते तुम्हारा नाम,
ना समझे अश्क भी आंखो से बरसे जाए सुबह- ओ- शाम,
ना सोए हम कभी गहरी नींद हमे तो आए ना,


सदाएं भी मेरी उस तक हवा लेकर के जाए ना,
ना तन से रूह निकलती है, ना थमती है मेरी धड़कन,
है पूरी जिंदगानी पर अभी तक है अधूरे हम।



उड़े जो रंग चाहत के वो यादों से मिले जाकर,
ढले सूरज की किरणें भी मेरी दहलीज़ पर आकर,
ज़माने की झूठी ज़िद्द में सज़ा दोनों ने पाया हैं,


टूटे दिल का हरेक टुकड़ा वफ़ा क्या खूब निभाया हैं,
ख़ुदा का हो करम तुम पर मिले मुझको तुम्हारे ग़म,
था हमसे ही शहर पूरा मगर अब है अधूरे हम।


मोहब्बत का जहां है बड़ा समझने का था भूल किया,
उमर भर का जो दर्द मिला उसे हंसकर क़ुबूल किया,
लगा रंग प्रीत का जो मुझ पर वो कुछ पल भी नहीं ठहरा,


गिरा जो बूंद रेतों पर वो कर के गया है घर गहरा,
शुकर कर तू मेरे मौला कि अब सांसे हो जाए कम,
पूरे हर मन के अरमां हो, रहे यूं ही अधूरे हम।।


रचियता :- मयंक श्रीवास्तव



मयंक श्रीवास्तव जनपद बलिया, उत्तर प्रदेश के निवासी है । मूलतः शिक्षक और हृदय से कवि है । विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के बाद अपना अधिकतम समय वे काव्य रचनाओं के लिए देते है । स्काई फाउंडेशन के वेब पोर्टल पर "अधूरे हम" उनकी दूसरी रचना है । स्काई फाउंडेशन की टीम उन्हें सफलता की ऊंचाइयों पर जाने हेतु कामना करती है । तथा उनकी रचना को अपने पोर्टल पर प्रेषित करने हेतु धन्यवाद देती है ।





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